!! तुम्हारा संत बनना असंभव है क्यों की यहाँ बनने और बनाने की परम्परा नहीं है !!
तुम बन नहीं सकते, क्योकि कोई नहीं बन सका। यह जान लो की संत बनना संभव नहीं, संत होना संभव है। तुम कहोगे इतने सारे लोग बने हैं तो मैं क्यों नहीं? तो इस सन्दर्भ में यह जान लो की उन सभी का संत बनना केवल बाह्य आडम्बर मात्र है, आतंरिक उत्कर्ष नहीं।
वास्तव में संत होना तो भीतर यानि अंतःकरण में घटने वाली घटना है। यह आतंरिक सुचिता का अंकुरण है। यह जीवन में सत्य के प्राकट्य की तुरीय अवस्था है। जिसकी प्राप्ति के उपरांत वस्त्रों का रंग बदलने की आवश्यकता नहीं पड़ती और न ही किसी प्रकार से पलायन की इच्छा ही पनपती है। संत होना अन्तःकरण की संवेदनात्मक प्रवृतियों पर निर्भर करता है। अन्तःकरण का निष्कलंक होना तथा बाह्य जगत में तृष्णा से मुक्त होना संत की स्वीकृत सनातन प्रवृत्ति हैं।
तुम्हारे मन में उपजी संत बनने की इच्छा तो केवल तुम्हारी कुंठित व्यक्ति परिकल्पना का परिणाम मात्र है। जो यह सिद्ध करता है की तुम्हारे अंतस में पात्रता का घोर अभाव है। तुम्हारे बनने में और होने में अभी अनंत अंतर है। तुमने तो प्रमादवश केवल जीवन संघर्षों से बचने के लिए एक मार्ग भर ढूंढा है। तुमने शिक्षा संस्कारों को पूर्ण करने से पूर्व ही विराम दे दिया है, क्योकि तुम्हारा मिथ्या ज्ञान तुम्हे बाह्य आडम्बरों को धारण कर तुम्हे भिक्षाटन के द्वारा केवल और केवल उदर की क्षुदा को शांत करने की प्रेरणा दे रहा है। पर स्पष्ट जानों की तुमने इस मार्ग का संकल्प ही गलत जाना है। तुमने इस दिव्य मार्ग का आलिंगन अभाव से किया है स्वभाव से नहीं। वास्तव में संत होना तो एक स्वभावगत अवस्था है जिसे लक्षित नहीं किया जा सकता।
संत वह है जो व्यक्ति को व्यक्ति से तथा व्यक्ति को समष्टि से जोड़ने वाली संस्कृति का परिमार्जन और विस्तार करने की क्षमता रखता है। वह जो जीवन कल्याण के लिए धर्म मार्ग को मौलिक और उच्चस्तरीय अभिव्यक्ति दे सकता है। वह निर्वाहन हेतु निर्भर नहीं होता बल्कि जनमानस को शिक्षा, और दीक्षा संस्कारों द्वारा आत्मनिर्भर बना सकता है। वह न तो पलायन करता है और न ही अन्य मनुष्यों में उसकी उत्प्रेरणा और आकांक्षा विकसित करने का प्रयास करता है। वह तो सामाजिक संकल्पों का श्रेष्ठ निर्वहन करने की क्षमताओं का विस्तार स्वयं और जनमानस में निरंतर करता रहता है। संस्कार, नीति, चरित्र, शाश्वत गुण बोध ही उसकी वैचारिक पात्रता और प्रकाश का आधार होता है।
तुमने तुम्हारे अंतस प्रमाद के वशीभूत होकर संत संकल्पों की अनुचित परिभाषा को गढ़ा है। तुमने स्वयं में कोई पात्रता विकसित नहीं की है। तुम अभाव से ग्रसित हो और साधू वस्त्रों को धारण कर केवल और केवल एक रोग की भांति सामाजिक कर्तव्यों और उनसे जुड़ीं व्यवस्थाओं का ध्वंश ही करोगे।
तनिक विचार करो की शिक्षा के अभाव में शब्द कहाँ से लाओगे? उच्चस्तरीय संकल्पों को अभिव्यक्ति किस प्रकार प्रदान करोगे? पात्रता नहीं, संकल्प नहीं , दया, करुणा, मैत्री, समता का बोध नहीं, धर्म की अभिव्यक्ति नहीं तो फिर क्या दे पाओगे? ऐसे तो केवल भटकोगे और सनातन शाखाओं को लाक्षण लगाओगे क्यों की तुम्हारा संत बनना और साधू वस्त्रों को धारण करना स्वभाव से नहीं अभाव से लक्षित है।
संत बनना संभव नहीं है। संत होना संभव है। इसलिय प्रथम सत्यनिष्ठ होकर यह जान लो की तुम जिस मार्ग पर चलना चाहते हो वह स्पष्ट करता है की तुम अभाव से नहीं अपितु स्वभाव से यह पुरुषार्थी जीवन व्यतीत करने आये हो। यह सहर्ष स्वीकारोक्ति का कठोर मार्ग है। बिना पात्रता के वस्त्रों के ये रंग तुम्हारे लिए व्यर्थ ही सिद्ध होंगे और सनातन शाखाओं को कलंकित करेंगे।
अतः प्रथम तुम स्वयं में पात्रता विकसित करो तभी तो जान पाओगे की तुम जिस मार्ग पर चलना चाहते हो, वह मार्ग तुम्हारे लिए उचित है की नहीं? तुम जान पाओगे की वास्तव में सामाजिक कर्तव्यों के निर्वहन में तुम्हारी भूमिका क्या है? इसलिए तुम शिक्षा को पूर्ण कर प्रथम स्वयं की बौद्धिक क्षमताओं का विकास करो। साथ साथ साधनात्मक प्रयासों द्वारा भावात्मक परिशुद्धता और परिपूर्णता को धारण करो। सद्बुद्धि और सद्गति के लिए धर्म बीजों का रोपण अंतस भूमि पर प्रारंभ करो। तुम्हारा संत बनना असंभव है तुम तत्काल लौट जाओ क्योकि यहाँ बनने और बनाने की की प्रथा नहीं है हो जाने की है।
(एक प्रश्न के संदर्भ में)
आचार्य कल्याण मित्र
पावन महाराज
Spread the love